(राम नवमी विशेष) :- मानवता की खुली आंख के सबसे सुंदर सपने ‘राम’

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(राम नवमी विशेष) :- मानवता की खुली आंख के सबसे सुंदर सपने ‘राम’


लेखाकार : ओम आदित्य द्विवेदी (बैतूल)


नव जीवन की संपूर्ण यात्रा नर से नारायण बनने की है। यह यात्रा जीव मात्र के जन्म से पूर्व ही उसके अस्तित्व से प्रारंभ होकर गर्भ, जन्म, सांसारिक कर्म, तपस्या, मृत्यु व मोक्ष तक निरंतर चलती रहती है। प्रायः सभी यात्राओं की शरुवात बड़ी है सरल व सुगम्य जान पड़ती है, फिर शनै शनै उसकी जटिलता भी हमारे सामने आती है। उसी तरह जब हम किसी अन्य के जीवन की कल्पना करते है तो हमे हमारे जीवन की अपेक्षा अन्य का जीवन सरल सुखद जान पड़ता है। हम प्रारंभिक दृष्टि से उनके संघर्षो को जान नही पाते। तत्व, आदर्श व नियम का आपसी समन्वय ही इस यात्रा को श्रेष्ठ बनाता है। और इसी यात्रा के चर्मोत्कर्ष है- श्रीराम। 

राम का सम्पूर्ण जीवन हमे इसी मानवीय यात्रा के कौशल सिखाता है। जहाँ राम के जीवन पर अपनी पहली लेखनी चलाने वाले महर्षि वाल्मीकि की संस्कृत रामायण से कंब रामायण तक में राम के जीवन को प्रभावी रूप से इंगित किया वहीं काव्य के इस स्वर्णिम काल मे तुलसी ने रामचरित को अपने शब्दों में विभिन्न प्रसंगों, उपमाओं, अलंकारों, छंद, दोहा, चौपाइयों के साथ दर्शाया। जो आज भी सर्वमान्य, सरल, सरस व लोकप्रिय है। राम के चरित्र का वर्णन में एक आदि घटना को यदि छोड़ दिया जाए तो प्रायः सभी रचनाकार एकमत ही दिखे। रामायण में उद्धत दर्शन व खगोलशास्त्र राम को ईश्वरीय शक्तियुक्त असाधारण गुणों का स्वामी मानती है तथा मनोविज्ञान, राजनीति, नैतिक व प्रकृति शास्त्र उन्हें पुरुषोत्तम व्यक्त करती है। समस्त विषयों का सार ही रामायण को धर्म, विज्ञान और आध्यात्म तीनो की मान्यता देता है।
यह तथ्य सर्वविदित है कि जब जब धर्म की हानि होती है, अधर्म व अत्याचार बढ़ने लगते है तब तब सकारात्मक ऊर्जा के साथ ईश्वरीय शक्ति का उद्धभव होता है, जिसे आस्तिक विचारों में अवतार कहते है। यह अवतार वह ईश्वरीय भरोसा है जो यह जताता है कि अब इन बुराइयों का नाश होकर जन कल्याण होगा। प्रकृति में होने वाले वही विश्वाशी नियामन है- राम।

राम का जन्म समाज के लिए एक लोक उदाहरण है। निश्चित ही मानव का जन्म विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होता है। उसी तरह राम का जन्म भी समाज मे नैतिक मूल्यों का आधार मजबूत करने के लिए ही हुआ था। कालगति से प्रमाणित इस कथा में रामजन्म के पूर्व ही खगोलीय घटनाएं आरम्भ हो जाती है। नक्षत्र-पिंड शुभ स्थिति पर आ जाते है, सूर्य अपनी रश्मियां बिखेर देता है, दसों दिशाएं प्रकाशित हो जाती है, पक्षी चहचहाने लगते है, कुसुमलता खिल उठती है, भँवरे गुंजन करने लगते है, झरनों-नदियों का वेग बढ़ जाता है, सुहावनी हवा के प्रवाह से पेड़-पौधे झूमने लगते है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वसुंधरा ने अपना पूर्ण श्रृंगार कर लिया हो और प्रभु राम के स्वागत में आतुर हो रही हो। ‘ विप्र धेनु सुर संत हित लीन्हि मनुज अवतार….’ चैत्र माह की नवमी तिथि को दिन के मध्य काल मे लोकहित हेतु अपने तीनों भाइयों के साथ रामलला का जन्म हुआ। इक्ष्वाकु वंश जिसके लिए कहा गया है कि वह ईख की भांति है जिसका न तो रस समाप्त होता है और न ही यश, ऐसे वंश में जन्मे दसरथ पुत्र राम शांत, विनम्र व अनुशासन जैसे गुणों से युक्त थे। जन्म से लेकर ही उनके अनेकानेक गुणों को दृष्टिगोचर किया जा सकता है। फिर चाहे नन्हे बालक का वह मनमोहक रूप हो जिसमें वे ठुमक ठुमक के चलते है-गिरते है,या फिर गुरुकुल में माताओं के अभाव में अपने भाइयों को लोरी गाकर सुलाते है। जब महामुनि विश्वामित्र के यज्ञों की असुरों से रक्षा हेतु राजा दशरथ, राम के अलावा स्वयं या पूरी सेना भेजने की बात करते है। तब महामुनि कहते है कि- यौवन, धन, संपत्ति व प्रभुत्व इनमें से कोई एक भी गुण आ जाने से व्यक्ति अहंकारी हो जाता है परन्तु राम के पास ये चारों गुण है और उसे फिर भी अहंकार नही है इसलिए मुझे सिर्फ राम ही चाहिए। विश्वामित्र के साथ जाने पर वहाँ के स्थानीय लोगो को प्रशिक्षित करते है। आततायी ताकतों के विरुद्ध आत्मनिर्भर बनाने की पहली सोच है-राम।

राम कुलमणी व पारिवारिक प्रेम की भी मूर्ति है। वे अपने कुल की रीतियों का सदा निर्वाहन करते हुए गुरुओं की रक्षा, पिता की आज्ञा, माताओं को सम्मान व प्रजा से मित्रवत व्यवहार रखते थे। वे भाइयों को प्राणों से अधिक प्रेम करते है। जब उन्हें राजसभा मे राजा मनोनीत कर दिया जाता है तो वह भ्रात प्रेमवश गुरु वसिष्ठ व राजा दशरथ से कहते है कि- “मैं ही अकेला राजा क्यों बनू। जब हम चारो भाई कुशल है तो चारो को राजा बनाया जाए।” भरत का भी राम के न होने से समस्त राजकीय सुखों को त्यागना, भाइयों में मजबूत प्रेम दर्शाता है। रघुकुल रीति सदा… को सिरोधार्य करते हुए माता कैकई के वर अनुसार पिता की आज्ञा से सहर्ष वनवास स्वीकार कर लेते है और माता कौशल्या को ढांढस बंधाते हुए कहते है कि- “पिता दीन्हि मोहे कानन राजू, जहँ सब भांति मोहि बड काजू”…पिता ने मुझे वन का राजा बना दिया है और मेरे सभी बड़े काम वहीं पर होंगे। राम ने पितृ आज्ञा का वह ज्वलंत दीपक जला दिया था जिसका प्रकाश युगों युगों तक फैलता रहेगा। पिता की मृत्यु पश्चात जब भरत मिलाप होता है तब भी राम सर्वप्रथम माता कैकई को चरण स्पर्श करते है, ताकि उपेक्षित कैकई मानद हो जाये। वो प्रजा को भी दुखी नही देख सकते थे इसलिए प्रजा भी उन्हे ही अपना राजा मानती थी। वह सिंहासन पर बैठ कर राजा नही बने वरन पौरुष, पराक्रम व परित्याग से राजा बने है-राम।

राम, समाजवाद के भी प्रणेता है। उनके जीवन की कार्यप्रणाली का दूसरा नाम प्रजातंत्र है। वे समस्त व्यक्तिगत हितों व स्वार्थ से परे है। वनगमन के दौरान ऐसे कई प्रसंग है जिसमे राम का सभी वर्गों से सीधा साक्षात्कार हुआ। वह प्रकृति, आयुर्वेद, वन्य प्रणियों को साथ लेकर अंतिम छोर पर खड़े तत्कालीन पिछड़े वर्ग-व्यक्ति के कल्याण की सोचते है। शिलावत अहिल्या को श्रापमुक्त कर महिला सम्मान किया। गंगा किनारे निषादराज-केवट की वह निस्वार्थ सेवा ने समाज को नया आयाम दिया। सबरी के झूठे बेर का रसास्वादन कर राम ने सामाजिक सौहार्द का आदर्श स्थापित किया था। जटायू का अंतिम संस्कार कर पुत्र धर्म निभाया। सुग्रीव के साथ मित्रता की अनुठी मिसाल बन उसे राजा बनाया। कुँवर अंगद को प्रोत्साहित कर युवा शक्ति को संबल प्रदान किया। विभीषण को अपनाया, लंका का राजपाठ दिया, विरोधियों को आत्मसात किया। सीता का वियोग सहा, लक्ष्मण मुरक्षा में अधीरता, समुद्र पर क्रोध, रामेश्वरम में भक्ति दिखी। तपस्वी, ब्राह्मण जैसा चरित्र धारण करने वाले क्षत्रिय है-राम।

राम कर्ता होकर भी कर्ता का गुमान नही रखते है। मानस में उनके अलावा एक पात्र हनुमान ही है जो दिग-दिगंतर तक याद रहे। उन्होंने बल व बुद्धि के प्रतीक हनुमान को अपने सेवक के रूप में स्वीकार किया साथ ही रामायण के सभी महत्वपूर्ण कार्य हेतु उन पर विश्वास भी दिखाया है। स्वामी भक्ति, सीता की खोज, संजीवनी, सुंदर कांड, अहि-महिरावण वध, लंका दहन, आदि प्रसंगों पर हनुमान की कीर्ति राम से भी ज्यादा बढ़ गयी। आध्यात्म रामायण में हनुमान को राम तक पहुँचने का मार्ग बताया गया है।हनुमान ने स्वामी भक्ति से मायारूपी सागर में ‘राम-नाम’ रूपी नैय्या की महिमा बताई है।

राम के जीवन मे कुछ भी चमत्कार नही है, सब कुछ अर्जित किया है। वे ईश्वर होने के बावजूद भी जन सामान्य की भांति ही संघर्ष करते है। किसी भी योद्धा को कम नही आंकते। सभी से नीतिगत युद्ध कर उन्हें परास्त करते है। राम रावण युद्ध मे एक जगह निराशा राम को भी घेर लेती है। छायावादी कवि निराला ने अपनी कृति ‘राम की शक्ति पूजा’ में लिखा है कि जब महासंग्राम में रावण प्रलय मचा देता है उस दिन राम निराश लौटते है। मंत्री चर्चा में राम बताते है कि रावण अधर्मी है फिर भी उसकी ओर से शक्तियां लड़ रही थी, हम अकेले थे। तब जाम्बवान कहते है कि आप भी शक्तिपूजा करे। तब राम एक सौ आठ कमल से नव दिन शक्ति साधना करते है। एक-एक कमल राम अर्पण करते जाते है और शक्ति साधते है। इसी बीच शक्ति राम की परीक्षा लेती है और अंतिम कमल अदृश्य कर देती है। अंतिम कमल को पूजाथाल में न पाकर राम का ध्यान भंग हो जाता है। वह एक क्षण के लिए सोचते है कि अंतिम कमल न मिलने से मेरी पूजा व्यर्थ हो जाएगी। तभी उन्हें स्मृत होता है कि माँ मुझे कमलनयन कहती थी, मेरे पास शक्ति को अर्पण करने के लिए अभी दो कमल शेष है। ऐसा सोचकर जैसे ही बाण की कोर आंख तक ले जाते है, शक्ति प्रगट होकर उन्हें रोकती है तथा प्रसन्नतापूर्वक विजयश्री का वरदान देते हुए त्रिकुटी में समाहित हो जाती है।(इन्ही शक्तिपूजा के नव दिनों को हम नवरात्रि के रूप में मनाते है।) कर्मवीर साधक की साधना का अर्जन है- राम।

राम की विजय सार्वभौमिक सत्य है। राम ने खरदूषण, कुंभकर्ण व कई राक्षसों को मारा। विभीषण को संदेह था कि रावण रथ पर सवार है, आप उससे कैसे लड़ेंगे। तब राम के उत्तर से उनका आत्मविश्वास झलकता है, वे कहते है कि मेरे पास भी रथ है जिसमे शौर्य और धैर्य दो चक्के है, बल-विवेक रूपी ध्वजा है, सत्य, शील और परहित इसके घोड़े है जिसे क्षमा, दया और कृपा ने बाँध रखा है। इस रथ पर सवार मैं रावण से युद्ध करूंगा। अंत मे राम अहंकार में मस्त रावण का नाश करते है। सत्य की असत्य पर जीत है- राम।

राजाराम बनने के साथ ही राम ने एकात्मकता का संदेश दिया। पवित्रता व चरित्र की दृढ़ता के कारण साहसिक निर्णय लिए। सभी के दुख महसूस किए। सभी को साथ लिया। डॉ कुमार विश्वाश लिखते है कि- “राम वन गए तो बन गए।” राजा दशरथ का पुत्र राजा बनता तो राम ही रहता वे वन गए, समाजिकता का अंगीकार किया इसलिए ‘श्रीराम’ बने। राम के चरित्र में अनेकानेक गुणों का होना ही उन्हें नर श्रेष्ठ बनाता है। रामराज्य की परिकल्पना आज भी की जाती है। भले ही राम के युग को परिवर्तन हुए कई शदियां बीत गयी परन्तु राम आज भी उन्ही गुणों के साथ समाज मे विद्यमान है। वर्तमान परिदृश्य में अपनी आंखें खोले प्रत्येक पालक यही स्वप्न सजाता है कि उनका पाल्य भी राम जैसे गुणों को धारण करें। उनका अनुसरण कर श्रेष्ठ मानव बनने का प्रयत्न करें ताकि यह सुखद स्वप्न एक दिन साकार हो सके…

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