June 22, 2021

लेख – राष्ट्रीय वैक्सीन नीति। कुछ ‘‘भटकाव‘‘ के बाद पुनः ‘‘सही दिशा‘‘ की ओर – राजीव खण्डेलवाल

Advertisements

लेख – राष्ट्रीय वैक्सीन नीति। कुछ ‘‘भटकाव‘‘ के बाद पुनः ‘‘सही दिशा‘‘ की ओर – राजीव खण्डेलवाल


टीका‘‘ किसे कहते है, इसे समझ लेते हैं। रोग से बचाव के लिए शरीर की रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता (इम्यूनिटी) को विकसित/बढ़ाने के लिए दी जाने वाली दवा को टीका (वैक्सीन) कहते हैं, और इस क्रिया को टीकाकरण (वैक्सीनेशन या इम्यूनाइजेशन)। संक्रामक रोगों से बचाव/रोकथाम के लिए टीकाकरण सस्ती व प्रभावी होकर सबसे कारगार विधि मानी गई गयी है। मतलब टीकों से बीमारी का इलाज नहीं होता है, बल्कि बीमारी के संक्रमण को रोकने में यह प्रभावशाली होती है।

भारत में सबसे पहले चेचक का टीका वर्ष 1802 में लगा था। भारत में ‘‘टीकाकरण‘‘ यूआईपी अर्थात‘‘यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम‘‘ का भाग है। इसके अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर 7 बीमारियों का टीकाकरण चल रहा हैं। जो अब 12 रोगों तक पहुंचने का अनुमान है। चेचक, (खसरे मीजल्स) हैजा, पोलियो, तपेदिक, डिप्थीरिया, टिटनस, टाइफाइड, हेपेटाइटिस-बी, गलसुएं (कंठमाला)।

आपके लिए यह जानकारी अवश्य दिलचस्प होगी कि पिछले समय से चल रहे समस्त टीकाकरण अभियान में मुख्य रूप से 18 वर्ष से कम बच्चे व गर्भवती महिलाओं इन दो वर्गो का ही टीकाकरण किया गया है। जिनका वार्षिक लक्ष्य क्रमशः 2.67 एवं 2.9 करोड़ का हैं।

वैश्विक महामारी कोविड़-19 से निपटने के लिए वैश्विक इतिहास में सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान हमारे देश में 16 जनवरी को प्रारंभ किया गया। परन्तु इस अभियान में उक्त दोनों वर्गो अर्थात बच्चों व गर्भवती महिलाओं को शामिल नहीं किया है। (यद्यपि इन दोनों वर्गो पर परीक्षण अभी जारी हैं) अन्तोगतवा पूर्ण सुरक्षा के लिये पूरी जनसंख्या पर ही टीका लगना है, और यह बहुत बड़ा टॉस्क है। अतः टीकाकरण की कमियों की आलोचना करने के पहले इस बड़े टॉस्क को भी ध्यान में रखना होगा।

16 जनवरी को जब हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक इतिहास के सबसे बड़े टीकाकरण के अभियान की घोषणा की थी, वह बिलकुल एक स्पष्ट व सही नीति थी। किसी भी तरह का कोई भ्रम (कन्फ्यूजन) नहीं था। हाँ, संख्या की दृष्टि से उक्त नीति जरूर सीमित थी। क्योंकि 140 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में एक दम से सबका टीकाकरण किया जाना संभव नहीं है। उक्त टीकाकरण में 18 से 44 उम्र के लोगों को प्राथमिकता नहीं दिये जाने पर कुछ क्षेत्रों में जरूर आलोचना हुई, जिसका संज्ञान केंद्रीय सरकार ने बाद में नीति में परिवर्तन लाते समय जरूर लिया हैं।

प्रधानमंत्री ने टीकाकरण के लिये ‘‘मिशन इंद्रधनुष’’(मूल आई) का एक प्रमख कार्यक्रम के रूप में मान्यता दी है।
जहां तक वैक्सीन उत्पादन का सवाल है, इनकी उत्पादक लेबोरेटरीज् व फैक्ट्रीयाँ राज्यों में स्थित है, जो अधिकतम निजी कम्पनियों के हाथों में है। भारत बायोटेक लिमिटेड़ जो कोवैक्सीन का उत्पादन कर रही है, अवश्य केंद्र सरकार के अधीन है। वैक्सीन निर्माण की नीति निर्धारण का अधिकार निश्चित रूप से केंद्र सरकार के पास है।

23 दिसंबर 2005 को राष्ट्रीय आपदा अधिनियम लागू होने से केंद्र सरकार द्वारा आपदा संबंधी योजना लागू करने पर राज्य सरकारों को उसका पालन करना होता है यह केंद्र सरकार का यह पूर्ण दायित्व हो जाता है कि वह वैक्सीन पर एक नीति एक ‘‘द़र’’ और ‘‘मांग’’ के अनुसार पूरे देश के लिये एक सही वितरण सिस्टम तय करें। लगभग चार महीने उक्त वैक्सीन नीति चलने के बाद केंद्र के द्वारा यह तर्क दिया गया कि राज्य सरकारें वैक्सीन के क्रय व वितरण में अपना हस्तक्षेप, दखलंदाजी व अधिकार चाहती हैं।

क्योंकि आखिर वितरण सिस्टम तो राज्य सरकारों का ही बनाया हुआ है और स्वास्थ्य राज्य का ही विषय है। ‘‘सब कुछ भारत सरकार ही क्यों करना चाहती है’’,‘‘मीडिया के एक वर्ग ने इसे कैंम्पेन के रूप में भी चलाया’’। आदि तरह-तरह के स्वर उठे व दबाव भी बनाए गये। तदनुसार केंद्र ने अपनी नीति में परिवर्तन करते हुये वितरण का अधिकार राज्य सरकारों को दे दिया और 25 प्रतिशत उन्हें सीधे क्रय करने की छूट भी दे दी गई।

भारत सरकार जो 100 प्रतिशत वैक्सीन 150 रू. की दर से दोनों कपंनी सीरम इंस्ट्टियूट व भारत बायोटेक केंद्र सरकार खरीद रही थी, उन्हे वह राज्य सरकारों के माध्यम से नागरिकों को निःशुल्क दे रही थी। इसमें संशोधन कर 25 प्रतिशत राज्य सरकारों व और बची हुई 25 प्रतिशत निजी क्षेत्रों को 600 व 1200 रू. में क्रय करने की छूट दी गयी।‘‘क्या यह गलत दबाव में लिया गया गलत निर्णय था’’? स्पष्टोक्ति न होने के बावजूद प्रधानमंत्री के कथन के भाव तो यही निकल रहे थे।

चार महीनों से चली आ रही केंद्र की उक्त मूल वैक्सीन नीति पर उक्त परिर्वतन के लिये दिये गये सरकार के उक्त तर्क किसी के भी गले के नीचे नहीं उतर रहे थे। न तो राज्य सरकारों और न ही नागरिकों के मन में।

बदलाव की इस गलत नीति के कारण टीकाकरण में अंततः तुलनात्मक रूप से कमी आयी। और 7 जून को प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्र के नाम संबोधन करते हुये पुनः वही तर्क अपनाते हुये अर्थात राज्य सरकारों के अनुरोध को स्वीकार करते हुये 16 जनवरी को घोषित की गई वैक्सीन नीति को पुर्नस्थापित किया गया। सिर्फ निजी क्षेत्रों को पूर्वतः सीधे क्रय करने की सुविधा जारी रहेगी। लेकिन प्रधानमंत्री के वैक्सीन क्रय को लेकर राज्यों द्वारा किये गये तथाकथित दावे तथ्योंपरक नहीं हैं। उच्च व उच्चतम न्यायालय की सरकार की वैक्सीन नीति पर लगातार अप्रिय टिप्पणी भी इस पुर्नविचार का कारण बनी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिये समग्र स्थिति दावे-प्रतिदावों पर विचार कर इस निर्णय पर ‘‘देर आए दुरूस्त आए’’‘‘सुबह का भुला शाम को घर आ जायें, तो उसे भूला नहीं कहते’’ की तर्ज पर बधाई अवश्य दी जानी चाहिये। परन्तु दुर्भाग्यवश राहुल गांधी ने फिर बचपना दिखाते हुये यह पूछा कि आज टीके सभी के लिये मुफ्त है तो फिर निजी अस्पतालों को पैसे क्यों लेने चाहिये।

कांग्रेस के मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि सरकार ने 25 प्रतिशत निजी हाथों में देकर लोगों को मरने के लिये छोड़ दिया। उक्त साधारण प्रश्न (जैसा कि राहुल गांधी ने वर्णित किया) साधारण न होकर असाधारण होकर राहुल की मंद बुद्धि का ही परिचायक है। क्योंकि सरकार ने टाटा, बिरला या गांधी सहित किसी भी नागरिक को निजी अस्पताल जाकर टीका लगाकर मरने के लिये मजबूर नहीं किया हैै।

जैसा कांग्रेस प्रवक्ता अपरिपक्व दावा करते है। वे भी सरकारों अस्पतालों में जाकर निःशुल्क टीका लगवा सकते है। लेकिन एक जिम्मेदार व सक्षम नागरिक होने के नाते टाटा, बिरला, अंबानी, अडानी,(गांधी नही) निश्चित रूप से निजी अस्पताल जाकर टीका लगवाकर देश के प्रति अंशदान कर लुटते रहेगें, जैसा कांग्रेस प्रवक्ता ने आरोप लगाया। यह जरा सी बात भी राहुल गांधी समझ नहीं पाये?

निजी अस्पतालों में जब टीकाकरण होगा, अति सक्षम लोग ही जायेगें जिनकी संख्या अधिक न होने के कारण अस्पताल जरूरत अनुसार ही टीका खरीदेगें और इस कारण से टीका का अनावश्यक संग्रह न होकर उसकी अन्यत्र कमी भी नहीं होगी। आखिर कांग्रेस क्या टीकाकरण के मुद्दे पर राहुल गांधी के उक्त ट्वीट के बयान द्वारा अडानी,अंबानी के साथ खंडे होकर उन्हे अपने पक्ष में तो खींचना नहीं चाहती हैं?

प्रधानमंत्री की 16 जनवरी को घोषित की गई वैक्सीन नीति में 26 अप्रैल को वैक्सीनेशन के तीसरे चरण का प्रारंभ करते समय 1 मई से वैक्सीन की ‘‘एक दर‘ को ‘‘त्रिस्तरीय‘‘ बनाकर राज्य सरकारों को 25 प्रतिशत व निजी क्षेत्रों को भी 25 प्रतिशत सीधे क्रय करने की छूट दी गई। तत्पश्चात विभिन्न क्षेत्रों में हुई आलोचना के तदोपरांत बाद 7 जून को राष्ट्र के नाम संबोधन करते हुए वैक्सीन नीति में पुनः परिर्वतन कर 16 जनवरी की पूर्व स्थिति में लगभग ला सा दिया गया।

महत्वपूर्ण बात यह है कि नीति में इस परिवर्तन के लिए प्रधानमंत्री द्वारा दिये गये तर्क न तो वस्तुस्थिति से मेल खाते हैं और न ही सार्थक व मजबूत तर्क है। यद्यपि नीति परिवर्तित कर मूल नीति की पुर्नस्थापन कर निर्णय बिल्कुल सही है। निश्चित रूप से राज्य सरकारों ने वैक्सीन वितरण में अपनी भागीदारी व हस्तक्षेप की इच्छा जरूर व्यक्त की थी, लेकिन उत्पादन से लेकर क्रय करने तक के संबंध में कभी भी किसी भी राज्य सरकार ने यह दावा या इच्छा व्यक्त नहीं की थी।

दूसरी बात देश के 28 एवं 9 केंद्र शासित प्रदेश हैं, जिसमें मात्र 5 में कांग्रेस व उसकी सहयोगी दलों की सरकारें और मात्र 7 राज्यों में दूसरे दलों की सरकारें है, जिनमें से कुछ ‘‘एनडीए‘‘ में भी शामिल है। अर्थात बहुमत प्रदेशों में शासन करने वाली भाजपा की सरकारें है? क्या इन भाजपा शासित राज्य सरकारों ने भी प्रधानमंत्री से भी तथाकथित दूसरे दलों के राज्यों के मुख्यमंत्रियों के समान केंद्र से उक्त ‘‘बदलाव‘‘ की अपील की थी? तो फिर विपक्ष शासित राज्यों को दोष देने का क्या मतलब? और यदि नहीं? तो क्या प्रधानमंत्री ने बहुमत की जगह अल्पमत को ‘‘तरजी़ह‘‘ देकर उसे स्वीकार किया?

सरकार ने अपनी वैक्सीन नीति के निर्णय को बदलने की स्थिति में भी न केवल अपनी पीठ थपथपाई, बल्कि संपूर्ण ‘‘गलती‘‘ को (सुझावों के रूप में) राज्यों पर न केवल ‘‘मढ़‘‘ दी। आगे मोदी यहां तक कह गए कि पिछले 50-60 साल के इतिहास को देखने पर यह पता लगेगा कि भारत को विदेशों से वैक्सीन प्राप्त करने में ‘‘दशकों‘‘ लग गये।

प्रधानमंत्री यहां पर यह भूल गये कि भारत विश्व के बडे़ वैक्सीन निर्माता देशों में से एक सबसे अच्छा वैक्सीन निर्माता देश रहा है। इस कोरोना आपदा काल में सरकार अनावश्यक रूप से अपनी पीठ थपथपाने के इस प्रकार के प्रयास से बच सकती थी, जो ज्यादा सहज स्थिति होती और विरोधियों को आलोचना का अवसर भी न मिलता। लेकिन मोदी के व्यक्तित्व की एक बड़ी खूबी यह है कि ‘‘आपदा में अवसर‘‘ निकालने का संदेश वे सिर्फ जनता को ही नहीं दे रहे है, बल्कि स्वयं भी निकाल रहे है। यह बात उनके कल के राष्ट्र के संबोधन में विपक्ष के आरोपों के जवाब में ‘‘संकेतों‘‘ से कही गई बातों (तंज) से भी सिद्ध होती है।

लेख

राजीव खण्डेलवाल

लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार

Advertisements

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

error:
WhatsApp chat