अमरनाथ मंदिर गुफा का इतिहास

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अमरनाथ मंदिर गुफा का इतिहास

इस गुफा के चारो तरफ बर्फीली पहाड़ियाँ है। बल्कि यह गुफा भी ज्यादातर समय पूरी तरह से बर्फ से ढंकी हुई होती है और साल में एक बार इस गुफा को श्रद्धालुओ के लिये खोला भी जाता है। हजारो लोग रोज़ अमरनाथ बाबा के दर्शन के लिये आते है और गुफा के अंदर बनी बाबा बर्फानी को मूर्ति को देखने हर साल लोगो भारी मात्रा में आते है।

इतिहास में इस बात का भी जिक्र किया जाता है की, महान शासक आर्यराजा कश्मीर में बर्फ से बने शिवलिंग की पूजा करते थे। रजतरंगिनी किताब में भी इसे अमरनाथ या अमरेश्वर का नाम दिया गया है। कहा जाता है की 11 वी शताब्दी में रानी सुर्यमठी ने त्रिशूल, बनालिंग और दुसरे पवित चिन्हों को मंदिर में भेट स्वरुप दिये थे। अमरनाथ गुफा की यात्रा की शुरुवात प्रजाभट्ट द्वारा की गयी थी। इसके साथ-साथ इतिहास में इस गुफा को लेकर कयी दुसरे कथाए भी मौजूद है।

पवित्र गुफा की खोज
कहा जाता है की मध्य कालीन समय के बाद, 15 वी शताब्दी में दोबारा धर्मगुरूओ द्वारा इसे खोजने से पहले लोग इस गुफा को भूलने लगे थे।

इस गुफा से संबंधित एक और कहानी भृगु मुनि की है। बहुत समय पहले, कहा जाता था की कश्मीर की घाटी जलमग्न है और कश्यप मुनि ने कुई नदियों का बहाव किया था। इसीलिए जब पानी सूखने लगा तब सबसे पहले भृगु मुनि ने ही सबसे पहले भगवान अमरनाथ जी के दर्शन किये थे। इसके बाद जब लोगो ने अमरनाथ लिंग के बारे में सुना तब यह लिंग भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग कहलाने लगा और अब हर साल लाखो श्रद्धालु भगवान अमरनाथ के दर्शन के लिये आते है।
40 मीटर ऊँची अमरनाथ गुफा में पानी की बूंदों के जम जाने की वजह से पत्थर का एक आरोही निक्षेप बन जाता है। हिन्दू धर्म के लोग इस बर्फीले पत्थर को शिवलिंग मानते है। यह गुफा मई से अगस्त तक मोम की बनी हुई होती है क्योकि उस समय हिमालय का बर्फ पिघलकर इस गुफा पर आकर जमने लगता है और शिवलिंग समान प्रतिकृति हमें देखने को मिलती है। इन महीने के दरमियाँ ही शिवलिंग का आकर दिन ब दिन कम होते जाता है। कहा जाता है की सूर्य और चन्द्रमा के उगने और अस्त होने के समय के अनुसार इस लिंग का आकार भी कम-ज्यादा होता है। लेकिन इस बात का कोई वैज्ञानिक सबूत नही है।

हिन्दू महात्माओ के अनुसार, यह वही गुफा है जहाँ भगवान शिव ने माता पार्वती को जीवन के महत्त्व के बारे में समझाया था। दूसरी मान्यताओ के अनुसार बर्फ से बना हुआ पत्थर पार्वती और शिवजी के पुत्र गणेशजी का का प्रतिनिधित्व करता है।

इस गुफा का मुख्य वार्षिक तीर्थस्थान बर्फ से बनने वाली शिवलिंग की जगह ही है।

अमरनाथ गुफा के लिए रास्ता –

भक्तगण श्रीनगर या पहलगाम से पैदल ही यात्रा करते है। इसके बाद की यात्रा करने के लिये तक़रीबन 5 दिन लगते है।

राज्य यातायात परिवहन निगम और प्राइवेट ट्रांसपोर्ट ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर रोज़ जम्मू से पहलगाम और बालताल तक की यात्रा सेवा प्रदान करते है। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर से प्राइवेट टैक्सी भी हम कर सकते है।

उत्तरी रास्ता तक़रीबन 16 किलोमीटर लंबा है लेकिन इस रास्ते पर चढ़ाई करना बहुत ही मुश्किल है। यह रास्ता बालताल से शुरू होता है और डोमिअल, बरारी और संगम से होते हुए गुफा तक पहुचता है। उत्तरी रास्ते में हमें अमरनाथ घाटी और अमरावाथी नदी भी देखने को मिलती है जो अमरनाथ ग्लेशियर से जुडी हुई है।

कहा जाता है की भगवान शिव पहलगाम (बैल गाँव) में नंदी और बैल को छोड़ गए थे। चंदनवाड़ी में उन्होंने अपनी जटाओ से चन्द्र को छोड़ा था। और शेषनाग सरोवर के किनारे उन्होंने अपना साँप छोड़ा था। महागुनास (महागणेश पहाड़ी) पर्वत पर उन्होंने भगवान गणेश को छोड़ा था। पंजतारनी पर उन्होंने पाँच तत्व- धरती, पानी, हवा, आग और आकाश छोड़ा था। और इस प्रकार दुनिया की सभी चीजो का त्याग कर भगवान शिव ना वहाँ तांडव नृत्य किया था। और अंत में भगवान देवी पार्वती के साथ पवित्र गुफा अमरनाथ आये थे।

अमरनाथ गुफा यात्रा
हिन्दुओ के लिये यहाँ भगवान अमरनाथ बाबा का मंदिर प्रसिद्ध और पवित्र यात्रा का स्थान है। कहा जाता है की 2011 में तक़रीबन 635, 000 लोग यहाँ आये थे, और यह अपनेआप में ही एक रिकॉर्ड है। यही संख्या 2012 में 625,000 और 2013 में 3,50,000 थी। श्रद्धालु हर साल भगवान अमरनाथ के 45 दिन के उत्सव के बीच उन्हें देखने और दर्शन करने के लिये पहुचते है। ज्यादातर श्रद्धालु जुलाई और अगस्त के महीने में श्रावणी मेले के दरमियाँ ही आते है, इसी दरमियाँ हिन्दुओ का सबसे पवित्र श्रावण महिना भी आता है।

अमरनाथ की यात्रा जब शुरू होती है तब इसे भगवान श्री अमरनाथजी का प्रथम पूजन भी कहा जाता है।

पुराने समय में गुफा की तरफ जाने का रास्ता रावलपिंडी (पकिस्तान) से होकर गुजरता था लेकिन अब हम सीधे ट्रेन से जम्मू जा सकते है, जम्मू को भारत का विंटर कैपिटल (ठण्ड की राजधानी) भी कहा जाता है। इस यात्रा का सबसे अच्छा समय गुरु पूर्णिमा और श्रावण पूर्णिमा के समय में होता है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने श्रद्धालुओ की सुख-सुविधाओ के लिये रास्ते भर में सभी सुविधाए उपलब्ध करवाई है। ताकि भक्तगण आसानी से अपनी अमरनाथ यात्रा पूरी कर सके। लेकिन कई बार यात्रियों की यात्रा में बारिश बाधा बनकर आ जाती है। जम्मू से लेकर पहलगाम (7500 फीट) तक की बस सेवा भी उपलब्ध है। पहलगाम में श्रद्धालु अपने सामन और कपड़ो के लिये कई बार कुली भी रखते है। वहाँ हर कोई यात्रा की तैयारिया करने में ही व्यस्त रहता है। इसीके साथ सूरज की चमचमाती सुनहरी किरणे जब पहलगाम नदी पर गिरती है, तब एक महमोहक दृश्य भी यात्रियों को दिखाई देता है। कश्मीर में पहलगाम मतलब ही धर्मगुरूओ की जमीन।

अमरनाथ यात्रा आयोजक –

अधिकारिक तौर पे, यात्रा का आयोजन राज्य सरकार श्री अमरनाथ यात्रा बोर्ड के साथ मिलकर करती है। सरकारी एजेंसी यात्रा के दौरान लगने वाली सभी सुख-सुविधाए श्रद्धालुओ को प्रदान करती है, जिनमे कपडे, खाना, टेंट, टेलीकम्यूनिकेशन जैसी सभी सुविधाए शामिल है।

अमरनाथ हिंदी के दो शब्द “अमर” मतलब “अनश्वर” और “नाथ” मतलब “भगवान” को जोड़ने से बनता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवी पार्वती ने भगवान शिव से अमरत्व के रहस्य को प्रकट करने के लिये कहा, जो वे उनसे लंबे समय से छुपा रहे थे। तब यह रहस्य बताने के लिये भगवान शिव, पार्वती को हिमालय की इस गुफा में ले गए, ताकि उनका यह रहस्य कोई भी ना सुन पाये और यही भगवान शिव ने देवी पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था।

सुरक्षा –

हर साल हजारो सेंट्रल और राज्य सरकार के पुलिस कर्मी श्रद्धालुओ की सुरक्षा में तैनात रहते है। जगह-जगह पर सेनाओ के कैंप भी लगे हुए होते है।

सुविधाए –

गुफा के रास्ते में बहुत सी समाजसेवी संस्थाए श्रद्दालुओ को खाना, आराम करने के लिये टेंट या पंडाल की व्यवस्था करते है। यात्रा के रास्ते में 100 से भी ज्यादा पंडाल लगाये जाते है, जिन्हें हम रात में रुकने के लिये किराये पर भी ले सकते है। निचले कैंप से पंजतारनी (गुफा से 6 किलोमीटर) तक की हेलिकॉप्टर सुविधा भी दी जाती है।

 

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NEWS IN ENGLISH

History of Amarnath Temple

There are snowy hills all around this cave. Rather, the cave is completely covered with snow most of the time and once a year the cave is also opened for the devotees. Thousands of people come every day to visit Amarnath Baba and Baba Hoonni, who is inside the cave, comes in huge amounts every year to see the idol.

It is also mentioned in history that the great ruler Arya Raja used to worship the snow-shaped Shivling in Kashmir. It has also been given the name of Amarnath or Amareshwar in the Rajatangini book. It is said that in the 11th century Rani Surimthi had given Trishul, Banalinga and other holy symbols as gifts to the temple. The journey of the Amarnath cave was started by the Thaibhabhatta. Along with this there are also other stories about this cave in history.

The search of the sacred cave
It is said that after the middle time, people were forgetting this cave before finding it again by priests in 15th century.

Another story related to this cave is from Bhrigu Muni. Long ago, it was said that the Valley of Kashmir was submerged and Kashyap Muni had flown the Kui rivers. That is why when the water started drying, Bhrugu Muni first saw Lord Amarnath ji. After this, when the people heard about Amarnath Ling, then this Ling called Bhagwan Bholenath Shivaling and now every year lakhs of devotees come to visit Lord Amarnath.
Due to the freezing of water droplets in the 40 meter high Amarnath cave, an ascending deposit of stone becomes. People of Hindu religion consider this snowy stone as Shivling. The cave remains of wax from May to August, because at that time the ice from the Himalayas melts and starts to come to this cave and we get to see the same replica of Shivlinga. Due to the dawn of these months, the day of Shivalinga decreases day by day. It is said that according to the time of the rising of the sun and the moon and the state of the penis, the size of this gender is also much less. But there is no scientific evidence of this.

According to Hindu Mahatma, this is the same cave where Lord Shiva explained to the mother Parvati the importance of life. According to other beliefs, the stone made of ice represents Parvati and Ganeshji, son of Shivaji.

The main annual pilgrimage to this cave is to replace the ice from the Shivling.

Path to Amarnath cave –

Devotees travel on foot from Srinagar or Pahalgam. It takes about 5 days to travel after this.

State Transport Transport Corporation and Private Transport Transport Operators provide daily travel services from Jammu to Pahalgam and Balatal. With this we can also make private taxi from Jammu and Kashmir.

The northern route is about 16 kilometers long, but it is very difficult to climb the path. This path starts from the pedestrians and reaches the cave through Domil, Burari and Sangam. On the northern side, we also see Amarnath valley and Amravati river which is connected to the Amarnath Glacier.

It is said that Lord Shiva had left Nandi and bull in Pahalgam (bull village). In Chandanwadi, he left Chandra with his jets. And they left their snake on the edge of the Sheshnag lake. He left Lord Ganesha on the Mahgunaas (Mahagnyesh Pahari) mountain. On Panjartani he left the five elements – earth, water, air, fire and sky. And thus leaving all the things in the world, Lord Shiva did not dance there. And finally the holy cave with Lord Devi Parvati came to Amarnath.

Amarnath cave travel
Here, Lord Amarnath Baba’s temple is a famous and sacred place for Hindus. It is said that in 2011 about 635,000 people had come here, and it is a record in itself. This number was 625,000 in 2012 and 3,50,000 in 2013. Every year the devotees arrive at Lord Amarnath during their 45-day festival to see and visit them. Most devotees come in the month of July and August only during the Shravani Mela, the most sacred Shravan month of Hindus is also coming.

When the journey of Amarnath begins, it is also called the first worship of Lord Shri Amarnathji.

In the olden times, the way to go towards the cave was passing through Rawalpindi (Pakistan) but now we can go directly to Jammu by train, Jammu is also called winter capital of India (capital of cold). The best time of this journey is in the time of Guru Purnima and Shravan Purnima. The Jammu and Kashmir government has provided all the facilities for the convenience of the pilgrims. So that the devotees could easily complete their Amarnath Yatra. But many times the rain in the travel of travelers comes as a barrier. Bus services from Jammu to Pahalgam (7500 feet) are also available. In Pahalgam, devotees also keep porter for their salmon and clothes several times. Everybody is busy preparing for the trip. Along with this, the shining golden sun of the sun falls on the Pahalgam river, then a delightful view is also visible to the passengers. Pahalgam in Kashmir means land of Dharmaguru.

Amarnath Yatra Organizer –

Officially, the state government organizes the trip together with the Amarnath Yatra Board. Government agencies provide all the amenities and amenities that are available during the visit, to all devotees including clothes, food, tents and telecommunication.

Amarnath means two words of “Amar” meaning “Anshwar” and “Nath” 

The meaning is made by adding “God”. According to a legend, when Goddess Parvati asked Lord Shiva to reveal the secret of immortality, which they were hiding from them for a long time. Then to reveal this secret, Lord Shiva took Parvati to this cave of Himalayas so that no one could hear this secret, and that Lord Shiva told the goddess Parvati the mystery of immortality.

Security –

Every year thousands of Central and State Government police personnel are stationed in the security of devotees. Army camps are also engaged in place.

Convenience –

On the way to the cave, many social service organizations arrange for the Shirdaluas to arrange food, rest or tents. More than 100 pandals are imposed on the way of travel, which we can also rent for staying at night. The helicopter facility from Panjarnarani (6 kms from the cave) is also given from the lower camp.

 

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