उज्जवला योजना : मुश्किल से होता है रोटी का जुगाड़, सिलेंडर भरवाना है असंभव

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उज्जवला योजना : मुश्किल से होता है रोटी का जुगाड़, सिलेंडर भरवाना है असंभव

नरसिंहपुर। जिले में प्रधानमंत्री उज्जवला गैस योजना के तहत गरीबों को बांटे गए मुफ्त गैस कनेक्शन में सैंकड़ों ऐसे गरीब हैं, जो गैस कनेक्शन मिलने के बाद दोबारा गैस सिलेंडर रिफिल नहीं करा सके। जिले में योजना के तहत करीब 1 लाख 48 हजार गैस कनेक्शन बांटे जाने का लक्ष्य है, जिसमें अब तक 56 से 60 फीसदी लक्ष्य पूरा किया जा चुका है। इन हजारों गैस कनेक्शनधारियों में सैकड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें दो वक्त की रोटी के लिए सिर्फ मजदूरी पर ही निर्भर रहना पड़ता है, उनके लिए गैस सिलेंडर रिफिल कराना किसी बड़े खर्च से कम नहीं है।

ग्राम करहैया निवासी सुमन पति मनोहर धानक को 4-6 महिने पहले गैस कनेक्शन मिला पर गैस सिलेंडर एक तरफ भूसा के कमरे में पड़ा है, चूल्हा दूसरी तरफ ढका रखा है, उस पर सब्जी की टोकरी रखी है। सुमन कहती हैं कि जब कनेक्शन मिला था, तब भर चालू किया, इसके बाद अब 700-800 रुपए नहीं हैं कि हम उसके रिफिल करा सकें, जिससे उसे एक तरफ रख दिया है। चूल्हे में ही भोजन पक रहा है। डेढ़ सौ-दो रुपए की मजदूरी में 6-7 लोगों का परिवार चलाना कठिन है। सुमन-मनोहर धानक के परिवार में दो बेटे और दो बेटियां हैं, इस तरह 6 लोगों का परिवार है, पति मजदूरी करता है।

इसी तरह ग्राम करहैया की ही ललिता बाई पति भरत धानक की कहानी भी मिलती-जुलती है। भरत मजदूरी करता है, 8-9 माह पहले इस परिवार को भी गैस कनेक्शन मिला, इसके बाद वह कभी भी दोबारा सिलेंडर नहीं भरा सका। ललिता का कहना है कि गैस महंगी पड़ रही है, मजदूरी करके गैस रिफिल कराना मंहगा है, परिवार की आमदनी का इतनी नहीं है कि हम 4-6 लोगों के भोजन की व्यवस्था कर सकें।

ललिताबाई, सुमन जैसे और दर्जन भर परिवार हैं, जैसे गुड्डीबाई पति कुलंदर सिंह धानक, खिमियाबाई पति लक्ष्मण धानक, इनकी भी कमोवेश स्थिति ललिता और सुमन की तरह है, जिनके परिवार के लोग सिर्फ मजदूरी करके ही जीवन-यापन करते हैं। बरसात के कई दिनों जब मजदूरी नहीं मिलती तो दो वक्त की रोटी निकालना इतना कठिन होता है कि परिवार के बच्चे, बुजुर्ग भरपेट भोजन करने में भी बड़ा कार्य समझते हैं।

ग्राम करहैया, करेली के अंतर्गत कठौतिया, गोटेगांव के अंतर्गत भामा, श्यामनगर, नरसिंहपुर के और दूरदराज क्षेत्रों ग्वारी, कपूरी आदि में कई ग्रामीणों के साथ बिडंबना यही है कि उन्हें गैस कनेक्शन तो मिल गए, लेकिन रिफिल कराना उनकी आर्थिक क्षमता के बाहर है। कई ग्रामीण तो ऐसे मिले, जिन्होंने गैस कनेक्शन तो ले लिए, लेकिन तंगी की वजह से उसे अपने किसी रिश्तेदार को दे दिया या फिर बेच दिया। गांव में मजदूरी मिलना कठिन है, मनरेगा को कार्य ठप पड़े हैं, जिससे मनरेगा के कार्य भी नहीं मिलते। छोटे बच्चे मजदूरी कर नहीं पाते, महिलाएं जितना संभव है गांव के ही कामकाज करके दो पैसे बचाने की फिक्र में रहती हैं।

पुरूष वर्ग काम तलाशने नगर क्षेत्र में आते हैं तो डेढ़ सौ-दो सौ, सवा दो सौ से ज्यादा आमदनी नहीं मिलती, हफ्ते में 5 या 6 दिन का काम मिलना और फिर परिवार के 6-7 लोगों का दो वक्त का भोजन जुटा पाना गरीब जाते हैं। घरेलू गैस रिफिल में वैसे तो 48 रुपए की वृद्धि कर देना आम उपभोक्ताओं के लिए परेशानी का सबब है। विशेष तौर पर गृहणियां मंहगी हुई गैस खफा हैं।

48 रुपए के साथ बढ़ी मुश्किलें –

गैस सिलेंडर भराई में 48 रुपए बढ़ गए, जिसे लेकर आमलोगों की शिकायत रही कि बिना शोरगुल किए चुपचाप पैसे बढ़ा दिए जाते हैं, लोगों को पता ही नहीं चल पा रहा है। आम उपभोक्ता बढ़ती मंहगाई से त्रस्त है।

गरीब सातवें वेतनमान से अनभिज्ञ –

समाज में गरीब और अमीर की बहुत बड़ी खाई पनप रही है। कोई सातवें वेतनमान के लिए लड़ाई लड़ रहा है तो एक तरफ ऐसे लोग भी बहुतायत में हैं, जिनके लिए 200 रुपए रोजाना का काम मिलना भी बहुत बड़ी चीज है और फिर दो-तीन बच्चे, बूढ़े मातापिता और पति-पत्नी का जीवनबसर करना मंहगाई के इस दौर में खून के आंसू रूला रहा है। गरीब नहीं जानते कि सातवां वेतनमान क्या है और बाजार में रोटी-सब्जी के अलावा दुनियादारी क्या है। अनेक गरीबों से चर्चा हुई तो उनका कहना था कि गैस कनेक्शन जब मिल रहा है तो कम से कम तीन माह के अंतराल में उसे मुफ्त में रिफिल करना भी मिल जाता तो बड़ा सहारा मिलता।

कई बड़ी बिल्डिंग वालों ने भी मुफ्त में लिए गैस कनेक्शन –

कठौतिया, करहैया, श्यामनगर, भामा जैसे गांवों में पाया गया कि जिनकी डबल स्टोरी हैं, घर में अच्छी-बड़ी खेतीबाड़ी है, संयुक्त परिवार है पर उन बड़ी बिल्डिंग वालों ने भी मुफ्त में उज्जवला गैस कनेक्शन पाकर गरीब पात्रों का हक मारा है। अच्छी खेतीबाड़ी और पक्का मकान रहने के बाद भी वह गरीबी रेखा की सूची में अपना नाम दर्ज कराए हैं। दबंगई है कि आपत्ति उठाएगा कौन? गांव में आखिर नेताजी के खास हैं।

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NEWS IN ENGLISH

Ujjwala scheme: It is difficult to make bread juga, cylinder is impossible

Narsinghpur. There are hundreds of poor people in the free gas connections distributed to the poor under the Prime Minister Ujjwala Gas Scheme in the district, which can not refill the gas cylinder after getting the gas connection. In the district, there is a target of distributing about one lakh 48 thousand gas connections under the scheme, in which 56 to 60 percent of the target has been completed so far. There are hundreds of people in these thousands of gas connections, who have to rely only on wages for two-time roti, refill gas cylinders for them is not less than any major expenditure.

Gram Karahaiya resident Suman Pati Manohar Dhank got gas connection before 4-6 months, but the gas cylinder was lying on one side of the straw, the stove was covered on the other side and kept a vegetable basket on it. Suman says that when the connection was received, then it started, then after that there are no 700-800 rupees so that we can refill it, which has kept it aside. The food is cooking in the stove itself. It is difficult to run a family of 6-7 people in one and a half rupees wages. Suman-Manohar Dhank’s family has two sons and two daughters, thus there is a family of 6 people, husband does wages.

Likewise, the story of Lalita Bai husband Bharat Dhanak of Village Karahaiya is also similar. Bharat wages, 8-9 months ago this family also got a gas connection, after which he could never get the cylinder again. Lalita says gas is becoming expensive, refilling gas by wages is costly, not so much of family income that we can arrange food for 4-6 people.

There are more than a dozen families like Lalitabai, Suman, like Guddibai husband Kulinder Singh Dhank, Khimiyabai husband Laxman Dhanak, and their unhygienic condition like Lalita and Suman, whose family members live only through wages. Many days of rain when labor is not available, it is so difficult to get two roti roti that the children of the family, elderly people, understand the big task in eating too.

Under gram karanaiya, Kareli, Kadautatiya, under Gotegaon, many villagers in Bhamba, Shyamnagar, Narsinghpur and remote areas of Gawari, Kapuri etc. have said that they got gas connections, but refilling them is outside their financial capacity. Many villagers found such a gas connection, but due to tightness, they gave it to a relative or sold it. It is difficult to get the wages in the village, the work has stopped MNREGA, which also does not get the work of MNREGA. Small children do not pay wages, women are worried about saving as much money as they can with the work of the village.

If the men work in the city area to find work, then no more than one hundred hundred and two hundred and two hundred are not found, the work of getting 5 or 6 days in the week, and then 6-7 people of the family can afford food for two times poor Go. In the domestic gas refill, raising of 48 rupees is likely to be a hassle for ordinary consumers. Especially the homemakers are gas-intensive.

Increased problems with 48 rupees –

48 cylinders increased in the gas cylinder filling, which has been the complaint of the common people that silently no money is raised, silently people are not able to know. The common consumer is plagued by rising inflation.

Unaware of the poor seventh pay scale –

There is a huge gap between the poor and the rich in the society. There is a fight for a seventh pay scale, so on one hand, such people are also in abundance, for whom getting 200 rupees a day’s work is also very big thing and then the life of two or three children, old parents and husband and wife is dear to This time blood tears are rouling. The poor do not know what is the seventh pay scale and what is worldly life besides the bread and vegetables in the market. Many poor were discussed, they said that if they got a gas connection, they could get a huge support if they could even refill it for at least three months in the interval.

Many big builders also have free gas connections –

In villages such as Kathautia, Karahaiya, Shyamnagar, Bhama, it was found that those who have double stories, there is a good farming in the house, a joint family, but those big builders have also got the right of poor characters after getting a free gas connection. Even after having a good farming house and a permanent house, he has registered his name in the list of poverty line. Who is going to take objection to the pressure? At the end of the village, Netaji is special.

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