स्वतंत्रता के 70 सालों के पश्चात भी क्या यही ‘‘परिपक्व’’ लोकतंत्र है? 

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स्वतंत्रता के 70 सालों के पश्चात भी क्या यही ‘‘परिपक्व’’ लोकतंत्र है? 

राजीव खण्डेलवाल-(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)

                               पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम आ गये हैं। चुनाव पूर्व का ‘‘ओपीनियन पोल’’ तुरन्त चुनाव बाद का ‘‘एक्जिट पोल’’ व अब ‘‘वास्तविक परिणाम’’ आपके सामने है। मैं यहाँ पर परिणामों का विश्लेषण नहीं कर रहा हूूंँ। ये सब ‘‘पोल’’ अनुमान के कितने नजदीक थे, सही थे, या आश्चर्य जनक थे, इस संबंध में भी कोई विशेष मूर्धन्य़ विवेचना अभी नहीं कर रहा हूँ,। इस संबंध में आपने अब तक कई लेख पढे़ होगें। मैं यहाँ पर इस चुनाव में उस जनता की इस चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने के आचार-विचार व मतदाता के हाव भाव पढ़ने और उसका सही आकलन करने का गंभीर प्रयास कर रहा हूँ, जिस पर आपके विचार भी सादर आमंत्रित है।

               इस चुनाव में प्रदेश के चुनावी क्षेत्रों में जब मैं घूमा, तब मुझमें यह ऐहसास जागा कि क्या यह सही वास्तविक लोकतंत्र है? क्या यह वही लोकतंत्र हैं, जिसकी शान में हम पूरे विश्व में अपनी पीठ थपथपाते नहीं थकते हैं।

                  सही लोकतंत्र का वास्तविक मतलब तब ही सार्थक माना जा सकता हैं, जब चुनाव के दौरान प्रत्येक मतदाता तात्कालिक रूप से निर्मित की गई एक छलावा पूर्ण भ्रम की स्थिति से प्रभावित हुये बिना पिछले पांच सालों के स्वयं के उम्मीदवार के प्रति अनुभव तथा उम्मीदवार व पार्टी की कार्यकुशलता व कार्य क्षमता के आधार पर सही पार्टी व व्यक्ति (उम्मीदवार) का चुनाव कर सकें। लेकिन यथार्थ में कई बार ऐसी विरोधाभासी परिस्थिति निर्मित हो जाती है, जब पार्टी व उम्मीदवार के संबंध में परस्पर विपरीत विचार भाव व आकलन की स्थिति बन जाती है। तब ऐसे में मतदाता के सामने एक दुविधा पूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि वह पार्टी को चुने या व्यक्ति (उम्मीदवार) को। यदि वह पार्टी को चुनता हैं तब उसका उम्मीदवार उसकी नजर में खरा नहीं उतरने के कारण अगले पांच वर्षो के लिये उसकी नजर में वह अनुपयुक्त सिद्ध होता है। फिर भी, उसके पास कोई विकल्प नहीं रहने के कारण पार्टी को चुनने के परिणामतः वह ‘अनुपयुक्त’ उम्मीदवार के पक्ष में मत देता है। ठीक इसके विपरीत योग्य व सही व्यक्ति के अनुपयुक्त पार्टी का उम्मीदवार रहने की स्थिति में उसकी गलत पार्टी को चुनने की मजबूरी बनी रहेगी।

                     प्रत्येक स्थिति में मतदाता एक गलत उम्मीदवार अथवा पार्टी को चुनने के लिए मजबूर होगा जिसके कारण आने वाले पांच वर्षो के कार्यकाल के लिए अपनी उम्मीदों की पूर्ति न हो पाने की जोखिम उसे उठानी पड सक़ती हैं। हमारे लोकतंत्र में इस प्रकार की कोई सटीक व्यवस्था नहीं है कि मतदाता सही पार्टी एवं सही उम्मीदवार दोनो का एक साथ चयन कर सके। वर्तमान व्यवस्था के तहत आम चुनाओं में कई बार व्यक्तिगत निष्ठा के आधार पर मतदाता चुनाव करता है जिसके परिणाम स्वरूप या तो लोकप्रिय पार्टी सत्ता से बाहर हो जाती है अथवा गलत उम्मीदवार चुन लिया जाता है।

                      बात यही तक सीमित नहीं रह जाती है। लोकतंत्र के सिक्के का दूसरा पहलू स्वयं मतदाता का लोकतंत्र की परीक्षा में खरा उतरना भी है। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता को एक पूर्ण आदर्श व्यक्ति मान लिया गया है, जो गलत है। वर्तमान चुनावी व्यवस्था में यह मानकर चला गया है कि प्रत्येक मतदाता स्वविवेक से, संपूर्ण ईमानदारी पूर्वक, बगैर किसी लोभ लालच अथवा या बाहुबल का भय, समाज व प्रदेश के हित में तथा उनके सतत विकास के लिये ही लोकतंत्र को मजबूत करने के लिये अपने मतदान का प्रयोग करेगें। यह एक आदर्श अवधारणा एवं अनुमान है, जो होना भी चाहिये। परन्तु वास्तविकता में क्या मतदाता इन सभी अपेक्षाओं की पूर्ति करता है? अधिकांश मामलो में आज भी इसका उत्तर नहीं ही होगा। क्या यह अधिकार उस उम्मीदवार के पास भी नहीं होना चाहिए कि वह अपने मतदाता से उसी ताकत से वे प्रश्न पूछे जो मतदाता उससे पूछता रहा है? यही लोकतंत्र का वास्तविक खतरा भी हैं।

                 लोकतांत्रिक व्यवस्था में चरित्र, ईमानदारी, भयमुक्त भष्ट्राचार रहित सर्वधर्म-सर्व समाज व्यवहार का उत्तरदायित्व क्या केवल उम्मीदवार का ही है, और मतदाता को केवल इस विषय में अनेकानेक प्रश्न करते रहने का अधिकार ही होना चाहिए? क्या मतदाता का कोई दायित्व नहीं होना चाहिय? क्या उम्मीदवार को भी मतदाता से उपरोक्त बातों के लिये सवाल पूछने व उस पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने का अधिकार तथा राज्य व राष्ट्र के हित में अपेक्षा करने का अधिकार नहीं होना चाहिए? इसीलिए मेरे जेहन में यह ज्वलंत प्रश्न उत्पन्न हुआ कि हमारा लोकतंत्र इन 70 सालो में क्या परिपक्व हो गया है?

                     एक बात और! सामान्य रूप से मतदाता इस भाव से मत देता है कि वह उम्मीदवार पर कोई उपकार कर रहा है, साथ ही वह उसके प्रतिफल में कुछ पाने की चाह भी रखता है। वह लोकतंत्र के महायज्ञ मंे मत डालना मात्र अपना कर्तव्य नहीं मानता है। इसीलिए आज भी हमारा लोकतंत्र संपूर्ण रूप से परिपक्व नहीं हैै बल्कि वास्तविक दृष्टि में धरातल पर अधूरा है।

                ‘‘लोक’’ व ‘‘तंत्र’’ को मिलाकर ‘‘लोकतंत्र’’ तो बन गया। लोगो को मतदान का अधिकार भी मिल गया। लेकिन वर्तमान में ‘‘तंत्र’’ ने ‘‘लोक’’ को सामान्य तथा भ्रष्ट आचरण की ओर धकेल दिया। इसीलिए प्रदेश व देश के गौरवशाली भावना पूर्ण तथ्य से लबालब वास्तविक लोकतंत्र अभी तक नहीं बन पाया। यह वास्तविकता है, जो हमने चुनाव में देखी है। आज भी लोग विशेष जाति, वर्ग, धर्म व क्षेत्र एवं समाज के आधार पर दबाव, ड़र व लालच पूर्ति से वोट देते है। धनबल और बाहुबल एवं व्यक्तिगत द्वेष, भविष्य के स्वार्थ की आशा व कल्पना में वोट देने को मजबूर होते है।

                           क्या लोकतंत्र तभी स्वस्थ्य नहीं होगा जब मतदाता सिर्फ और सिर्फ अपने स्वविवेक से अपने मन की बात को निष्पक्ष रूप से ईवीएम मशीन की बटन दबाकर व्यक्त कर सके। जहां चुनाव के दौरान मतदाता को अनैतिक व गैर कानूनी रूप से प्रभावित न किया जा सके। कुल मिलाकर आदर्श मतदान करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मतदाता की रहे यह स्थिति बनाने का उत्तरदायित्व सिर्फ और सिर्फ मतदाता का ही है और इस विषय का उत्तर गर्भ में है जो सिर्फ मतदाता ही दे सकता हैं। जब तक मतदाता से स्पष्ट आदर्श व्यवहार नहीं मिल जाता हैं तब तक मतदाता द्वारा चुने गये उम्मीदवार को भी मतदाता पर उंगली उठाने का अधिकार माना जाना चाहिए।

                       राजतंत्र के समय कहावत प्रचलित थी ‘‘यथा राजा तथा प्रजा’’। चूंँकि लोकतंत्र में ‘‘प्रजा’’ ही ‘‘राजा’’ ‘‘(नेता)’’ की चुनती है, अतः वर्तमान में उक्त कहावत का स्वरूप बन गया है ‘‘यथा प्रजा तथा नेता (राजा)।’’ इसलिए जब तक प्रजा अपने आप को हर प्रकार से स्वच्छ नहीं बना लेती तब तक केवल नेता पर दोषारोपण करते रहने का कितना/क्या औचित्य? एक नागरिक व मतदाता होने के नाते प्रत्येक का यह कर्तव्य है कि वह इस पर गहनता से विचार कर स्वयं का आत्मविश्लेषण करे, तभी सार्थक व परिपक्वता की ओर बढ़ता हुआ लोकतंत्र स्थापित हो पायेगा।

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