भस्मासुर से बचने को यहां छुपे थे शिवजी, आज भी है पैरों के निशान

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भस्मासुर से बचने को यहां छुपे थे शिवजी, आज भी है पैरों के निशान

जगदलपुर । यदि आप धार्मिक यात्रा में एडवेंचर और इको टुरिज्म का भी लुत्फ उठाना चाहते हैं तो गुप्तेश्वर से बेहतर जगह शायद ही मिले। छत्तीसगढ़ के जगदलपुर और ओडिशा के कोरापुट जिले के सरहद पर रामगिरी पर्वत श्रृंखला के गुप्तेश्वर पहाड़ी पर स्थित गुफा के अंदर विशालकाय शिवलिंग और उस पर पहाड़ी की छत से टपकती पाताल गंगा की निर्मल जलराशि से मन किसी और ही दुनिया में पहुंच जाता है और सफर की पूरी थकान दूर हो जाती है।

रोमांच भरा है सफर, पग-पग में है खतरा
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 300 किमी दूर संभाग मुख्यालय जगदलपुर से करीब 75 किमी की दूरी पर स्थित गुप्तेश्वर का सफर बेहद ही रोमांच से भरा हुआ है। जगदलपुर-विशाखापटनम हाइवे पर 22 किमी दूर धनपुंजी गांव के पास यहां जाने के लिए कच्ची सड़क गुजरती है।

इस मार्ग पर करीब 35 किमी दूर वनग्राम तिरिया पहुंचने के बाद रोमांचक सफर शुरू हो जाता है। यहां वन विभाग का नाका व विश्राम भवन है। जहां पंजीयन के बाद ही श्रद्धालु आगे बढ़ सकते हैं। सर्पिली धूल भरी जंगल की सड़क, रास्ते के दोनों ओर साल-सागौन के ऐसे घने जंगल की सूर्य की रोशनी भी छन के नहीं आती, वीरान 17 किमी के एडवेंचर फॉरेस्ट के सफर के बाद आती है चट्टानों पर चिंघाड़ती-दहाड़ती शबरी नदी आती है।

यहां तक ही चार पहियों वाहनों से पहुंचा जा सकता है। यहां विशाल चट्टानों पर बांस की बनी चटाई पर गुजरते हुए लंबी कतार में बोल बम के नारे लगाते हुए नदी पार करना कम रोमांचकारी नहीं है। नदी के उस पार ओडिशा और पहाड़ी श्रृंखला की हरियाली मन मोह लेती है।
यहां पहाड़ी पर दो किमी की दूरी पैदल चलने पर गुप्तेश्वर की पहाड़ी का विहंगम द्श्य सामने आता है। 170 सीढियां चढ़कर मंदिर पहुंचा जा सकता है जहां पहाड़ी के अंदर गुफा में भारत के विशालकाय शिवलिंगों में से एक बाबा गुप्तेश्वर अवस्थित हैं। इस मार्ग पर शिवरात्रि और गर्मी के मौसम में ही जा सकते हैं।
शिवरात्रि आने पर वन विभाग फिर से बांस की चटाई का रास्ता तैयार करती है। वहीं साल में बारह महीने हाइवे पर ओडिशा के जैपुर से 60 किमी की दूरी तय कर गुप्तेश्वर पहुंचा जा सकता है।

शिवरात्रि में भरता है विशाल मेला
गुप्तेश्वर में वैसे तो साल भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है पर सावन के सोमवार और महाशिवरात्रि के दौरान यहां लंबी कतार लगती है। शिवरात्रि में मेला एक सप्ताह तक भरता है। ओडिशा, छत्तीसगढ़ के अलावा आंध्र तथा अन्य राज्यों से भी यहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं। इस प्राकृतिक शिवालय की वास्तुकारी भी बेजोड़ है जिसे भगवान विश्वकर्मा द्वारा बनाए जाने की मान्यता है।

किवदंती यह भी है कि भस्मासुर से बचने के लिए शिवजी ने ब्राहम्ण के रुप में यहां शरण ली थी। शिवजी के पगचिन्ह भी गुफा में है। यह कितना पुराना है इसके बारे में कोई नहीं जानता। इस शिवालय में भगवान भोलेनाथ को चावल का प्रसाद चढ़ता है।

दर्शन करने के बाद गरीब ब्राह्मणों को चावल का दान करने की प्रथा है जिसके लिए बड़ी संख्या में ब्राह्मण यहां पहुंचते हैं और शिवरात्रि के दिन इनके पास एक से डेढ़ क्विंटल चावल इकट्ठा हो जाता है।

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NEWS IN ENGLISH

Shivaji is still here to hide from Bhasmasur, even today’s footprints

Jagdalpur If you want to enjoy adventure and eco-tourism in religious travel, then there is hardly a better place than Gupteeshwar. Jagdalpur in Chhattisgarh and Koraput district of Odisha, on the outskirts of the Ramgiri mountain range, on the Gupteeshwar hill, inside the cave, the Giant Shivaling, and on the terrace of the hill, on the terrace of the river Ganga, the water of the river reaches the mind in some other world and travel Complete fatigue is removed.

The adventure is full, the danger is in danger
Located about 300 km away from Chhattisgarh’s capital Raipur, about 75 km from the divisional headquarters Jagdalpur, Gupteeshwar’s journey is full of excitement. On the Jagdalpur-Vishakhapatnam Highway, 22 km away to Dhanpuji village, the raw road passes.

After reaching Vanagram Tiria about 35 km away on this route, the exciting journey begins. Here is the Nanda and Sutan Bhawan, the forest department. Where devotees can proceed only after registration. The sun-dried forest road, on both sides of the road, the sunlight of such a dense forest of Sal-teak is also not filtered, after the journey of the deserted 17-km Adventure Forest, the chinkhed-roaring Shabari river comes on the rocks.

Even four wheels can be reached by vehicles. Passing the bamboo mat on huge cliffs, passing the slogan in the long queue, crossing the river is not less exciting. The greenery of the Odisha and the hill ranges across the river attracts the heart.
Here is a glimpse of the hill of Gupteeshwar when walking a distance of two kilometers on the hill. The temple can be reached by climbing 170 stairs, where Baba Gupteeshwar is one of the largest Shivlalings of India in the cave under the hill. This route can be reached only during Shivratri and summer season.
On the arrival of Shivratri, the forest department again prepares the path of bamboo mat. Gupteeshwar can be reached at a distance of 60 km from Japur, Odisha, on a twelve-month highway in the year.

Vishal Mela fills in Shivratri
In Gupteeshwar, however, devotees visit the devotees throughout the year, but there is a long queue during Sawan’s Monday and Mahashivaratri. Fair in Shivratri fills up for a week. Apart from Odisha, Chhattisgarh, there are also a large number of pilgrims here from Andhra and other states. The architectural architecture of this natural pavilion is also unmatched, which is believed to be made by Lord Vishwakarma.

Kavdanti is also to avoid Bhasmasur, Shiva took shelter in the form of a Brahmin. Shivaji’s Pagkhaan is also in the cave. Nobody knows about how old it is. In this pagoda, the offerings of rice to Lord Bholenath are ascertained.

After visiting, it is the practice of donating rice to poor Brahmins, for which a large number of Brahmins arrive here and on one hand, they collect one to one and a half quintals of rice on the day of Shivratri.

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