टिप्पणी – चलो चकल्स चुनाव भाग ( २ )

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टिप्पणी – चलो चकल्स चुनाव भाग ( २ )

सचिन शुक्ला, शाहपुर

जुगत लगेगी, टिकट बंटेगी,
छूट मिलेगी, लूट मचेगी,
घर फूटेंगे, अपने लड़ेंगे, पहचान यही कोहराम की
चलो कि चकल्लस फिर शुरू हो गई चुनाव की…

बहुत हो गया ज्ञान और बहुत हो गया गणित। दल, चेहरा, लड़ाई झगड़ा जो भी हो नगर सरकार कैसे बनेगी और कैसे चलेगी, भला ऐसा कौन है जो नहीं जानता। तो जनता को बिना लेन देन के चकल्लस की आजादी तो बनती है। आज हम आपको केवल राज की बातें बताने वाले हैं।

सो ध्यान लगाकर अंत तक सुनिए और समझिए

पहली तो यह कि राजनीति में ना बाप बड़ा ना भैया। मौका मिले तो पिता पुत्र से लड़ जाए, मां बेटी से भिड़ जाए। भाई भाई का दुश्मन बन जाए, और जो खुद ना बने तो राजनीति बना दे। हां यह भी हो सकता है कि दोनों दलों में पैठ बनी रहे और जब जिस भी करवट ऊंट बैठै काम ना रुकें, इस सोच के साथ भी कई लोगो के द्वारा यह राजनीतिक कृत्य किया जाता है वोटर अंजाम है अपने नगर शाहपुर की राजनीति की तासीर भी कुछ ऐसी ही है। इससे अच्छे-अच्छे राजनैतिक परिवार अछूते नहीं हैं।

जहां अपने ही अपनों के सामने दमखम दिखाते नजर आएंगे। खड़े हैं। कुल मिलाकर बचपन का वह खेल याद करें तो आनंद आएगा कि हम भी खेलेंगे नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे। जब तक पार्टी पूरे पत्ते नहीं खोलती दावेदारों की जोर आजमाइश जारी रहेगी।

👇 मतदाता बंधुओं याद रखे

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अपने मत को मत करना बेकार,
समझें, परखें, देखें, जानें सब हैं समझदार।
नहीं चयन किसी निशान का हो जीत एक नेक इंसान की हो,
चलो कि चकल्लस फिर शुरू हो गई चुनाव की।

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