मनसंगी मंच पर विषय ” घर की नींव” पर आयोजित प्रतियोगिता मे नरेन्द्र ,रामकुमारी,लता देवी ने मारी बाजी

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*मनसंगी मंच पर विषय ” घर की नींव” पर आयोजित प्रतियोगिता मे नरेन्द्र ,रामकुमारी,लता देवी ने मारी बाज

मनसंगी साहित्य संगम जिसके संस्थापक अमन राठौर मन जी सहसंस्थापिका मनीषा कौशल जी अध्यक्ष सत्यम जी के तत्वाधान में काव्यधारा समूह पर आयोजित प्रतियोगिता जिसका विषय घर की नींव रखा गया उसमें कई रचनाकारों ने विभिन्न राज्यों से भाग लिया अपनी स्वरचित रचनाए प्रेषित की समीक्षक का कार्यभार आदरणीय इंदु धूपिया जी ने बखू

मनसंगी साहित्य संगम मंच द्वारा आयोजित प्रतियोगिता

बी संभाला इन्होंने कहा सभी रचनाएं एक से बढ़कर एक है जिससे उन्हें चयन करने में काफी समस्या हुई छोटी छोटी बारीकियों को ध्यान में रखकर उन्होंने प्रथम स्थान नरेन्द्र वैष्णव सक्ति जी को द्वितीय स्थान राम कुमारी जी तथा तृतीय स्थान लता देवी पौड़ैल जी को इनकी

रचनाएं निन्मवत है।।

“मनसंगी काव्य धारा”

विषय – “घर की नींव”
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घर की नींव समझते मुझको , सारा घर परिवार ।
शिष्ट -सभ्य बातें होती हैं , अपना शुभ संस्कार ।।
नेह प्रीत की दामन नीचे , खुशियों का संसार ।
मातु-पितु का शुभ आशीष ही , बनता जग आधार ।।

रिश्तों की प्रेमिल दुनिया में , मधुर धूप जन छाँव ।
शहर छोड़ तू आ जा प्यारे , निश्छल मेरा गाँव ।।
चाचा-चाची मामा-मामी , भैया-भाभी यार ।
प्रेम प्रकृति के शुभ भावों से , आज सजा लो द्वार ।।

निर्मल सरिता की धारा सी , दादी बाँटे प्रेम ।
दादा के हुक्के की ज्वाला , दृश्य सजाए हेम ।।
घर की नींव बनाने मुझको , पिता करें तैयार ।
छोड़ जगत के झंझट प्यारे , सजा मधुर व्यवहार ।।

दिव्य -पुंज गुरुवर का पाकर , खिलता हृदय प्रदेश ।
घर की नींव सजा लो साथी , महके जग परिवेश ।।
सुंदरता की परिभाषा में , मिलता प्रेम अपार ।
रहें परस्पर हिलमिल आओ , यही जगत का सार ।।
(नरेन्द्र वैष्णव “सक्ती”)

विषय /घर की नींव

घर की नींव पिता और माता,
बड़े बुजुर्ग ही तो होते है ।
कोई भी मुश्किल आये घर में,
पहले वो खुद सहते है।

जिन घर की दीवारो में,
बड़ो का आशीष नहीं है।
उन महलो से झोपडी अच्छी,
जहाँ पर प्रेम –प्रीत नहीं है।

अपनों के लिये न हो समर्पण,
तो सब कुछ ही बेकार है।
घर नही है वह मकान है,
ईट पत्थर और दीवार है।

घर की नींव गहरी होती जब,
सहन शक्ति का मिलता भाव।
तरक्की पर चलता परिवार,
आपस में रहता है लगाव।

बिकता है बाजार में सब ,
भावनाओ का मोल नहीं।
परिवार की नीवं हिले ना,
माता-पिता अनमोल रहे।
रामकुमारी गंगा

कपकपाते हाथ है उनके, लड़खड़ाते पांव
बोल भी नहीं पाते हैं अच्छे से
तुतलाती है जवाँ उनकी
उठ नहीं पाते हैं आजकल
बिस्तर से बिना किसी सहारे के
लोग कहते हैं ,बुढ़े हो चुके हैं वो
पर मैं कहती हूँ , परिपूर्ण स्वयम में ही सम्पूर्ण हो गए हैं,
जी हाँ, वो मेरे पिता हैं
मेरे घर की नींव हैं जो
उसी घर को शालीनता और संस्कार से
हरा भरा किया मेरी मैया ने है
वो कहती है हम कलियाँ हैं
उसके बागवान के
खिलना है जिन्हे खुशबू बिखेर कर
महकाना है जग को सारे
थामना है घर की नींव को भी
आगे जाके देकर पिता के कंधे
को देकर सहारा ।

(स्वरचित)
लता देवी पौडेल
गांगमौथान असम

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