पीएनबी घोटाला: बैंकों का राष्ट्रीयकरण बुरी तरह फेल रहा है?

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NEWS IN HINDI

 पीएनबी घोटाला: बैंकों का राष्ट्रीयकरण बुरी तरह फेल रहा है?
20 जुलाई, 1969 को टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने पर दो बड़ी खबरें छापी थीं. पहली खबर थी कि इंदिरा गांधी 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया है. और दूसरी बड़ी खबर थी कि अपोलो मिशन चांद की कक्षा में प्रवेश कर गया है. ये दोनों ही ख़बरें अपने-अपने क्षेत्र में मील का पत्थर थीं. बैंकों का राष्ट्रीयकरण भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा कदम था. वहीं अपोलो मिशन के चांद की कक्षा में पहुंचने से इंसान के चांद पर पहुंचने का रास्ता खुला. इंदिरा गांधी सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था. ये अध्यादेश मोरारजी देसाई के मंत्रिमंडल से बाहर होने के एक घंटे के भीतर ही जारी कर दिया गया था.

पहले राउंड में जिन 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, वो थे- सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, देना बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, सिंडिकेट बैंक, कनारा बैंक, इंडियन बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, यूनियन बैंक, इलाहाबाद बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, यूको बैंक और बैंक ऑफ इंडिया. 1980 में दूसरे राउंड में 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया. ये बैंक थे-आंध्रा बैंक, कॉरपोरेशन बैंक, न्यू बैंक ऑफ इंडिया, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, पंजाब ऐंड सिंध बैंक और विजया बैंक.

बैंकों का राष्ट्रीयकरण, भारत में बैंकिंग व्यवस्था शुरू होने के बाद सुधार का सबसे बड़ा कदम था. इसका मकसद था भारत के दूर-दराज के गांवों तक बैंकिंग की सुविधा पहुंचाना. मगर, ये कदम बहुत बड़ी भूल साबित हुआ. बैंकों के राष्ट्रीयकरण ने ऐसी निकम्मी संस्थाओं को जन्म दिया, जो भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े में आकंठ डूबी हैं. सियासी तिकड़म की शिकार हैं.

राष्ट्रीयकरण का असर
हां, बैंकों के राष्ट्रीयकरण से इतना तो हुआ कि कृषि क्षेत्र में ज्यादा कर्ज दिए जाने लगे. कुछ और क्षेत्रों में भी लोन देने की प्रक्रिया तेज हुई. इसके अलावा बैंकों के राष्ट्रीयकरण से सरकार को बिना किसी सवाल जवाब के कल्याणकारी योजनाएं लागू करने में भी काफी मदद मिली. लेकिन इन बैंकों ने कभी भी खुद से अपना रख-रखाव और बचाव करना नहीं सीखा. इन बैंकों को सरकारी बैसाखी की लत पड़ गई. इसने इन्हें लापरवाह बना दिया. सरकारी बैंकों ने कभी खुद की फिक्र करनी नहीं सीखी. न ही इन बैंकों ने खुद को बाजार यानी निजी बैंकों से मुकाबले के लिए तैयार किया. इन बैंकों ने अपने सियासी आकाओं को खुश करने के लिए आपस में होड़ लगाई. हर साल पूंजी के लिए ये वित्त मंत्रालय के सामने कटोरा लेकर खड़े हो जाते थे.

राष्ट्रीयकरण के बाद से सरकारी बैंकों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ. जबकि इसी दौरान निजी बैंकों में तकनीक के इस्तेमाल, कारोबार के विस्तार और मैनेजमेंट को लेकर बहुत सारे बदलाव हुए हैं. सरकारी बैंकों को स्वायत्तता हासिल नहीं है. साल में सिर्फ एक बार सरकारी बैंकों का बजट में उस वक्त जिक्र होता है, जब सरकार उनमें पूंजी लगाने का एलान करती है. या फिर किसी नई जनहित की योजना को बैंकों के जरिए लागू किया जाना होता है.

संपत्ति के लिहाज से देश के दूसरे सबसे बड़े सरकारी बैंक, पंजाब नेशनल बैंक में हुआ फर्जीवाड़ा इन बैंकों में कई दशक से चले आ रहे काम-काज के तरीके का नतीजा है. यहां कुछ बैंक कर्मचारियों ने नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के साथ मिलकर अवैध लेटर ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी एलओयू जारी किए. इसकी बड़ी वजह है सरकारी बैंकों के काम-काज का माहौल. इन बैंकों में किसी की कोई जवाबदेही नहीं है. फिर चाहे मैनेजमेंट हो या निवेशक. सरकारी बैंकों में कारोबार के जोखिम से निपटने की कोई सटीक व्यवस्था नहीं. बैंक कर्मचारियों का बैंक और कामकाज को लेकर कोई अपनापन नहीं. न ही किसी खतरे और गलत फैसलों को रोकने के लिए कारगर नियामक व्यवस्था है.

पंजाब नेशनल बैंक में हुए घोटाले में हमने देखा कि बैंकों में निगरानी की सारी व्यवस्था को धता बताकर फर्जीवाड़ा किया गया. किसी भी बैंक अधिकारी ने ये देखने की जहमत नहीं उठाई कि नीरव मोदी को कर्ज बांटने में नियमों का पालन किया जा रहा है या नहीं. बैंक में शाखा के स्तर पर ऑडिट से लेकर बैंक के बोर्ड तक बड़े लेन-देन की निगरानी की व्यवस्था है. लेकिन, जालसाज निगरानी और रोकथाम के पूरे सिस्टम को झांसा देकर 7 साल तक बैंक को लूटते रहे.

पी जे नायक पैनल-वो वादा जो कभी पूरा नहीं हुआ-
हाल के दिनों में सरकारी बैंकों में सुधार के बड़े सुझाव रिजर्व बैंक के बनाए एक पैनल की तरफ से आए थे. इस पैनल के अध्यक्ष थे एक्सिस बैंक के पूर्व चेयरमैन पी जे नायक. नायक और उनके साथियों ने मई 2014 को सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में सरकारी बैंकों के निजीकरण का सुझाव दिया था. पैनल का मानना था कि सरकारी बैंकों की उत्पादकता दिनों-दिन घटती जा रही है. ये निजी बैंकों और बाजार की दूसरी ताकतों से मुकाबले लायक नहीं रह गए हैं. सरकारी बैंकों की पूंजी का स्तर भी गिरता जा रहा है. मतलब ये कि सरकारी बैंक, निजी बैंकों के मुकाबले घटिया काम कर रहे हैं. उनकी जो जमा-पूंजी है उसकी कीमत घटती जा रही है. ऐसे कर्ज का बोझ बढ़ रहा है, जो शायद कभी न वसूले जा सकें.

पी जे नायक पैनल ने सरकारी बैंकों को लेकर जो सुझाव दिए थे, उनमें से कुछ प्रमुख बातें थीं-

-कुछ अधिकृत निवेशकों को बिना किसी नियामक मंजूरी के, बैंकों में 20 फीसद तक हिस्सेदारी रखने का अधिकार दिया जाना चाहिए.

-अगर किसी बैंक की माली हालत खराब है तो निजी शेयरधारकों और फंड को बैंकों में हिस्सेदारी बढ़ाकर 40 प्रतिशत करने की इजाजत होनी चाहिए.

-एक बैंक इनवेस्टमेंट कंपनी बनाकर, सरकार को बैंकों में अपनी हिस्सेदारी इस कंपनी के हवाले कर देनी चाहिए. ये इनवेस्टमेंट कंपनी स्वायत्त संस्था होनी चाहिए.

-सरकार को सिर्फ सरकारी बैंकों पर लागू होने वाले दिशा-निर्देश जारी करने बंद करने चाहिए. इससे बैंकिंग सेक्टर में निजी और सरकारी बैंकों के बीच भेदभाव होता है.

-सरकार को बैंकों में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 50 फीसद से कम करनी चाहिए. ताकि, बैंक सतर्कता, कर्मचारियों की सैलरी और काम-काज की बेहतरी, सूचना के अधिकार और कारोबार में दूसरे बैंकों से मुकाबले लायक बन सकें.

पैनल की रिपोर्ट के हवाले से लाइवमिंट ने लिखा था कि ‘अगर काम-काज बेहतर करने के लिए जरूरी हो, तो सरकार बैंक इनवेस्टमेंट कंपनी में भी अपनी हिस्सेदारी 50 फीसद से कम ही रखे, क्योंकि अगर बीआईसी कामयाब होती है, तो इसका सबसे ज्यादा फायदा सरकार को ही होगा’. मगर, अफसोस की बात ये है कि पी जे नायक पैनल के ज्यादातर सुझाव कागजी ही रह गए. किसी ने भी सरकारी बैंकों में सुधार और खास तौर से निजीकरण के इन प्रस्तावों पर ध्यान नहीं दिया.

इंद्रधनुष आया…और चला गया
सरकारी बैंकों में सुधार का अगला बड़ा प्रस्ताव अगस्त 2014 में इंद्रधनुष योजना के रूप में आया था. सरकारी बैंकों में सुधार के कुछ और वादे किए गए. लेकिन ये वादे भी कागजी ही रह गए.

इंद्रधनुष योजना में सात प्रमुख बातें थीं, जिनके जरिए सरकारी बैंकों को बेहतर बनाया जाना था-

प्राइवेट सेक्टर के बैंकों के अधिकारियों को सरकारी बैंकों का प्रमुख बनाया जाए.

एक बैंक बोर्ड ब्यूरो बनाया जाए, जो सरकारी बैंकों के निदेशक बोर्ड के साथ तालमेल से बैंकों की तरक्की और विकास की रणनीति बनाए.

सरकारी बैंकों में सालाना पूंजी निवेश का प्लान बने.

जोखिम रोकने के तरीके, प्रोजेक्ट की निगरानी और कर्ज न चुकाने वालों से निपटने के नियम मजबूत हों.

सरकारी बैंकों को स्वायत्तता मिले.

बैंक के अधिकारियों की जवाबदेही का ढांचा तैयार हो.

बैंकों में काम-काज के तरीकों में सुधार किया जाए.

इस एक्शन प्लान को कितना लागू किया गया है? सच पूछें तो कुछ सरकारी बैंकों में निजी बैंकों के अधिकारियों को प्रमुख नियुक्त करने और बैंकों में सालाना पूंजी निवेश लगाने के सिवा कुछ नहीं हुआ. सरकारी बैंकों में जोखिम से निपटने के तौर-तरीके बदलने और काम-काज सुधारने को लेकर कोई काम नहीं हुआ. ये प्रस्ताव अब तक कागजी ही हैं.

ये उम्मीद बुनियादी तौर पर ही गलत है कि निजी क्षेत्र के अधिकारियों को सरकारी बैंकों में नियुक्त करने से सरकारी बैंक अच्छा काम करने लगेंगे. सरकारी बैंकों का वर्क कल्चर तो वही रह गया, जो पहले था.

बिजनसे स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो मार्च के आखिर तक अपना बोरिया-बिस्तर समेट लेगा. वजह ये कि ये कभी भी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा. बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो की बड़ी जिम्मेदारियों में सरकारी बैंकों में मानव संसाधन का बेहतर मैनेजमेंट और बैंक के प्रबंधन के लिए कोड ऑफ कन्डक्ट तैयार करना था. लेकिन पीएनबी घोटाले से साफ है कि बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो अपनी जिम्मेदारियां निभाने में नाकाम रहा है. अगर ब्यूरो ने कुछ किया भी है, तो उसका असर फिलहाल तो नहीं दिख रहा है. सरकार ने सार्वजनिक बैंकों में 2.11 लाख करोड़ रुपयों के निवेश का वादा किया है. इस रकम से सरकारी बैंकों की दिक्कत का फौरी समाधान ही हो सकता है.

बैंकों के राष्ट्रीयकरण का फैसला पलटने का वक्त आ गया है?
सरकारी बैंकों की समस्याएं इतनी पेचीदा और गहरी हैं कि सिर्फ पूंजी लगाने से इन्हें दूर नहीं किया जा सकता. पीएनबी घोटाले ने हमें बताया है कि उनकी बीमारी बहुत पुरानी है और इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं. इन्हें खत्म करने के लिए बड़ी सर्जरी की जरूरत है.

अब वक्त आ गया है कि सरकार इंदिरा गांधी के बैंकों के राष्ट्रीयकरण के फैसले को पलटने पर विचार करे. क्योंकि, बैंकों का राष्ट्रीयकरण बुरी तरह नाकाम रहा है. ऐसे में हमें बैंकों के निजीकरण के विकल्प पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। बैंकों का राष्ट्रीयकरण इसलिए किया गया था ताकि देश के दूर-दराज के इलाकों के लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा जा सके. सरकारी बैंकों ने काफी हद तक इस लक्ष्य को हासिल करने में मदद की है. जबकि निजी बैंक, ज्यादा मुनाफे और बेहतर कारोबार के चक्कर में सिर्फ शहरी इलाकों तक ही सीमित रहे हैं.

लेकिन राष्ट्रीयकरण के पांच दशकों बाद सार्वजनिक बैंक, सरकार के मालिकाने में निकम्मे ही साबित हुए हैं. यही वजह है की पी जे नायक पैनल ने इनके निजीकरण का सुझाव दिया था. आज की तारीख में 90 फीसद एनपीए सरकारी बैंकों के खातों में ही है. एनपीए वो रकम है, जो बैंकों ने कर्ज के तौर पर बांट रखी है और जिसका भुगतान कर्जदार बैंकों को नहीं कर रहे हैं. पीएनबी घोटाले ने एक बार फिर ये साबित किया है कि सरकारी बैंकों के फर्जीवाड़े, जालसाजी और घोटाले का शिकार होने की आशंका ज्यादा रहती है. इससे बैंकिंग सिस्टम का जोखिम बढ़ता है. पिछली घटनाओं से सबक लेते हुए सरकार को कम से कम अब तो बैंकों के निजीकरण के बारे में सोचना चाहिए.

जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि देश के बैंकिंग सिस्टम को बचाने के लिए जरूरी हो गया है कि इन पर सरकार का मालिकाना हक खत्म हो और सार्वजनिक बैंकों को निजी हाथों में सौंप दिया जाए. इसके बाद भी सरकार जरूरतमंद लोगों को खास तौर से कर्ज देने का निर्देश इन बैंकों को दे सकती है.

जब इन बैंकों को निजी क्षेत्र चलाएंगे तो अधिकारियों की जवाबदेही ज्यादा होगी. कर्ज बांटने में जोखिम का खयाल रखा जाएगा. लापरवाही कम होगी. सरकार को सभी 21 सरकारी बैंकों को एक झटके में निजी हाथों में सौंपने की जरूरत नहीं. सरकार ऐसा भी कर सकती है कि पांच-छह बड़े सरकारी बैंकों का मालिकाना अधिकार अपने हाथों में रखे. ताकि, सामाजिक क्षेत्र को बैंकिंग की सुविधा मुहैया कराई जा सके और सरकार कल्याणकारी योजनाएं लागू करने में इन बैंकों की मदद ले सके. पर, किसी भी पैमाने पर कस कर देख लें, हमें 21 बैंकों पर सरकारी नियंत्रण की कोई जरूरत नहीं लगती. वक्त आ गया है कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण के इंदिरा गांधी के फैसले को पलट दिया जाए.

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NEWS IN ENGLISH

PNB scam: Nationalization of banks is failing badly?

On 20th July, 1969, the Times of India published two big news on the first page. The first news was that Indira Gandhi has nationalized 14 banks. And the second big news was that Apollo missions entered the moon’s orbit. Both of these reports were milestones in their respective fields. Nationalization of banks was a big step for the Indian economy. At the same time, reaching the moon’s orbit in the Apollo mission opens the way for the human being to reach the moon. The Indira Gandhi government nationalized banks through an ordinance. This Ordinance was issued within one hour of being out of the Cabinet of Morarji Desai.

The 14 banks which were nationalized in the first round were Central Bank of India, Bank of Maharashtra, Dena Bank, Punjab National Bank, Syndicate Bank, Canara Bank, Indian Bank, Indian Overseas Bank, Bank of Baroda, Union Bank, Allahabad Bank, United Bank of India, UCO Bank and Bank of India. In the second round, 6 more banks were nationalized in 1980. These banks were Andhra Bank, Corporation Bank, New Bank of India, Oriental Bank of Commerce, Punjab and Sind Bank and Vijaya Bank.

Nationalization of banks, after the introduction of banking system in India, was the biggest step in reform. Its purpose was to facilitate banking facilities to far-flung villages of India. But, these steps proved to be a big mistake. Nationalization of banks gave rise to such nonsensical institutions, which are deeply entrenched in corruption and fraud. Political tricks are a victim of

Effect of nationalization
Yes, the nationalization of the banks so much happened that more loans were being given in the agriculture sector. In some other areas, the process of giving loans also increased. Apart from this nationalization of the banks also helped the government to implement welfare schemes without any questions. But these banks never learned to maintain and protect themselves. These banks became addicted to government crutches. It made them careless. Government banks have never learned to worry about themselves. Nor did these banks prepare themselves to compete with the market ie private banks. These banks competed with each other to please their political masters. For capital every year, they used to stand in front of the finance ministry with a bowl.

There has not been any major change in governmental banks since nationalization. In the meantime, there have been a lot of changes in the use of technology, business expansion and management in private banks. Government banks do not have autonomy. Only once a year, government banks are referring to the budget when the government declares them to invest in them. Or the plan of a new public interest has to be implemented through banks.

In the case of property, the fraud in the country’s second largest government bank, Punjab National Bank, is a result of the work-time pattern of many decades in these banks. Here some bank employees, along with Neerav Modi and Mehul Choksi, issued illegal Letter of Understanding (LoL). The main reason is the working environment of government banks. There is no accountability of any of these banks. Whether it is management or investor There is no precise arrangement to deal with the risks of business in government banks. There is no acceptance of bank employees’ banking and functioning. Nor is there an effective regulatory system to prevent any danger and wrong decisions.

In the scandal in the Punjab National Bank, we saw that all the surveillance system in the banks was fraudulent and fraudulent. No bank official has bothered to see whether rules are being followed in distributing debt to Nirav Modi or not. There is a system of monitoring large transactions from the audit to the bank’s board at the branch level in the bank. But, the entire system of counterfeit surveillance and prevention would have been robbing the bank for 7 years.

PJ Nayak Panel – The promise which was never completed-
In recent times, major suggestions for improvement in government banks came from a panel created by the Reserve Bank. The panel was headed by PJ Nayak, former Chairman of Axis Bank. Nayak and his colleagues suggested the privatization of government banks in their report submitted to the government in May 2014. The panel believed that the productivity of government banks is declining day by day. These are not worth the money from private banks and the other forces of the market. The level of capital of government banks is also declining. This means that government banks are doing poorly against private banks. The value of which they have deposited is going down. The burden of such a debt is increasing, which can never be recovered.

Some of the major things that PJ Nayak panel had suggested for government banks were:

– Some authorized investors should be given the right to hold up to 20 per cent of the shares in the banks, without any regulatory sanction.

-If a bank’s Mali condition is bad, private shareholders and funds should be allowed to increase the stake in banks to 40 percent.

By making a bank investment company, the government should give its share of shares in this company to the company. These investment companies should be autonomous bodies.

-The government should stop issuing the guidelines applicable only to the public sector banks. This prevents discrimination between private and public sector banks in the banking sector.

-The government should reduce its stake in banks to less than 50 percent. So that banks can become vigilant, employees’ salaries and betterment of work, right to information and compete with other banks in the business.

Regarding the report of the panel, Livemint wrote that if the government is required to do better, then the government should also keep its stake in the bank investment company for less than 50 percent, because if BIC is successful, then its highest The advantage will be to the government only ‘ But, sadly, most of the suggestions in the PJ Nayak panel remain paperwork. Nobody has paid attention to these proposals for improvement in government banks and especially privatization.

Rainbow came … and gone
The next big proposal for improvement in government banks came in the form of the rainbow scheme in August 2014. Some more promises of improvement in government banks were made. But these promises remained the same paper.

There were seven major things in the rainbow scheme, through whom the government banks were to be improved-

The officers of the private sector banks should be made heads of government banks.

A bank board bureau can be made, which in coordination with the governing banks of the public sector banks can be developed and developed by the banks.

Annual capital investment plans in government banks

Rules for dealing with risks, monitoring the project and dealing with non-repayers will be strong.

Government banks get autonomy

The structure of accountability of bank officials is ready.

Improve ways of working in banks.

How much has this action plan implemented? In fact, nothing is done except for appointing private bank officials in some government banks and investing in bank’s annual capital investment. There is no work to change the manner in dealing with risks and to improve the working conditions in government banks. These proposals are still paperwork.

It is basically wrong that the government bank will start doing good work by appointing private sector officials in government banks. Work culture of government banks remained the same, which was earlier.

According to the Bijnen Standard report, the boarding bureau will reconstruct its bore-bed by the end of March. The reason is that it never fulfilled the expectations. Among the major responsibilities of the Banking Board Bureau was to create better management of human resources in government banks and code of conduct for the management of the bank. But it is clear from the PNB scam that the Banking Board Bureau has failed to fulfill its responsibilities. If the bureau has done something then its effect is not visible at the moment. The government has promised to invest 2.11 lakh crore rupees in public banks. This amount can be an immediate solution to the problem of government banks.

The time has come to reverse the decision of nationalization of banks?
The problems of the government banks are so tricky and deep that they can not be overcome by just applying capital. The PNB scam has told us that his illness is very old and its roots are very deep. There is a need for big surgery to finish them.

Now the time has come that the government will consider reversing the decisions of nationalization of Indira Gandhi’s banks. Because, nationalization of banks has failed miserably. In such a situation, we should seriously consider the option of privatization of banks. Nationalization of the banks was done so that people from far-flung areas of the country could be linked to the banking system. Government banks have helped in achieving this goal to a great extent. While the private banks are restricted to more urban and urban areas, more profit and better business turnover.

But after five decades of nationalization, the public bank has proved to be worthless in the ownership of the government. This is the reason why the PJ Nayak panel suggested their privatization. Today, 90 percent of the NPA is in the accounts of government banks. NPA is the amount, which banks have distributed as loans and are not paying the borrowers to the banks. Once again, the PNB scam has proved that there is a high probability of getting fake bank accounts of fake bank accounts, frauds and scams. This increases the risk of banking system. Taking lessons from the previous incidents, the government should at least think about privatization of banks now.

As I said earlier, it has become necessary to save the banking system of the country that the ownership of the government is over and handed over to the public banks in private hands. Even after this, the government can direct the banks to give special loans to the needy people.

When these banks run private sector, the responsibilities of the officials will be much higher. Risk will be taken care of in distributing debt. Negligence will be less. The government does not need to hand over all the 21 public sector banks in one stroke in private hands. The government can also do it in the hands of five or six major government banks. In order to facilitate banking facilities to the social sector and the government can take help of these banks in implementing welfare schemes. But, look at any scale, we do not seem to need government control over 21 banks. The time has come to overturn Indira Gandhi’s decision to nationalize the banks.

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